ज्योतिष सीखिए, भाग – 03

त्रिकोण, केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम, मारक भाव

त्रिकोण, केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम तथा मारक किन-किन भावों को कहा जाता है? इसे नीचे लिखे अनुसार समझना चाहिए :

(1) त्रिकोण – पंचम तथा नवम भाव को ‘त्रिकोण’ कहा जाता है।

(2) केन्द्र – प्रथम, चतुर्थ, सप्तम तथा दशम – इन चारों भावों को ‘केन्द्र’ कहा जाता है।

(3) पणफर – द्वितीय, पंचम, अष्टम तथा एकादश इन चारों भावों को ‘पणफर’ कहा जाता है।

(4) आपोक्लिम – तृतीय, षष्ठ, नवम तथा द्वादश – इन चारों भावों को ‘आपोक्लिम’ कहा जाता है। 

(5) मारक – द्वितीय तथा सप्तम भाव को ‘मारक’ कहा जाता है।

नीचे दी गई उदाहरण कुण्डली में उक्त त्रिकोण, केन्द्र, पणफर, आपोक्लिम तथा मारक भावों की स्थिति को कुण्डली के विभिन्न भावों में प्रदर्शित किया गया है :

आवश्यक टिप्पणी – कुछ विद्वानों के मतानुसार द्वितीय तथा दशम भाव को पणफर एवं तृतीय तथा एकादश भाव को आपोक्लिम माना गया है। कुछ अन्य विद्वान षष्ठ तथा अष्टम भाव को पणफर तथा द्वितीय एवं द्वादश भाव को आपोक्लिम मानते हैं।

मूल त्रिकोण

जन्म कुण्डली के द्वादश भावों में विभिन्न राशियां अलग-अलग भावों में रहती हैं। उनमें सामने लिखे अनुसार जिस राशि के जितने अंश पर जो ग्रह हो, उसे ‘मूल त्रिकोण में स्थित’ समझना चाहिए :

(1) सूर्य – सिंह राशि में, 1 से 20 अंश तक।

(2) चन्द्रमा – वृष राशि में, 4 से 30 अंश तक।

(3) मंगल – मेष राशि में, 1 से 18 अंश तक।

(4) बुध – कन्या राशि में, 1 से 15 अंश तक।

(5) बृहस्पति (गुरु) – धनु राशि में, 1 से 13 अंश तक।

(6) शुक्र – तुला राशि में, 1 से 10 अंश तक।

(7) शनिश्चर – कुम्भ राशि में, 1 से 20 अंश तक।

मूल त्रिकोण के ग्रहों की स्थिति को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आगे आठ कुण्डलियाँ दी जा रही हैं। इनमें पहली सात कुण्डलियों में प्रत्येक ग्रह को अलग-अलग मूल त्रिकोण में स्थित दिखाया गया है तथा अंतिम कुण्डली में मूल त्रिकोण के सभी ग्रहों को एक साथ अपनी-अपनी राशि में स्थित दिखाया गया है, अतः इन्हें देखकर मूल त्रिकोणस्थ ग्रहों के विषय में भली-भांति जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिए। ये कुण्डलियाँ वृष लग्न की हैं। इन्हीं के आधार पर अन्य लग्न वाली कुण्डलियों के विषय में भी भी समझ लेना चाहिए।

आवश्यक टिप्पणी – राहु को कर्क राशि में मूल त्रिकोणगत माना जाता है। इसी के आधार पर कुछ विद्वान केतु को मकर राशि में मूल त्रिकोणगत मानते हैं।

ग्रहों की उच्च तथा नीच स्थिति

जातक की जन्म कुण्डली में जिस राशि के जितने अंश गत हो चुके हों, उसके अनुसार विभिन्न ग्रह उच्च तथा नीच स्थिति को प्राप्त करते हैं।

ग्रहों की उच्च स्थिति – ग्रहों की उच्च स्थिति के बारे में नीचे लिखे अनुसार समझना चाहिए :

(1) सूर्य – मेष राशि के 10 अंश पर उच्च का माना जाता है।

(2) चन्द्रमा – वृष राशि के 3 अंश पर उच्च का माना जाता है।

(3) मंगल – मकर राशि के 28 अंश पर उच्च का माना जाता है।

(4) बुध – कन्या राशि के 15 अंश पर उच्च का माना जाता है।

(5) बृहस्पति (गुरु) – कर्क राशि के 5 अंश पर उच्च का माना जाता है।

(6) शुक्र – मीन राशि के 27 अंश पर उच्च का माना जाता है।

(7) शनिश्चर – तुला राशि के 20 अंश पर उच्च का माना जाता है।

टिप्पणी – राहु तथा केतु छाया ग्रह है, अतः ज्योतिष शास्त्र के अनेक ग्रंथों में इनकी उच्च अथवा नीच स्थिति के विषय में कोई उल्लेख नहीं किया गया है, परन्तु कुछ विद्वानों के मत से मिथुन राशि के 15 अंश पर राहु उच्च का माना जाता है तथा कुछ के मतानुसार वृष राशि में राहु उच्च का माना जाता है। इसी प्रकार कुछ विद्वानों के मतानुसार धनु राशि के 15 अंश पर केतु उच्च का माना जाता है और कुछ के मतानुसार वृश्चिक राशि में केतु उच्च का माना जाता है।

ग्रहों की नीच स्थिति – प्रत्येक ग्रह को जिस राशि के जितने अंशों पर उच्च का बताया गया है, उससे सातवीं राशि के उतने ही अंशों पर वह नीच का होता है। इसे नीचे लिखे अनुसार और अधिक स्पष्ट रूप में समझ लेना चाहिए :

(1) सूर्य – तुला राशि के 10 अंश पर नीच का होता है।

(2) चन्द्रमा – वृश्चिक राशि के 3 अंश पर नीच का होता है।

(3) मंगल – कर्क राशि के 28 अंश पर नीच का होता है।

(4) बुध – मीन राशि के 15 अंश पर नीच का होता है।

(5) बृहस्पति (गुरु) – मकर राशि के 5 अंश पर नीच का होता है।

(6) शुक्र – कन्या राशि के 27 अंश पर नीच का होता है।

(7) शनिश्चर – मेष राशि के 28 अंश पर नीच का होता है।

टिप्पणी – राहु और केतु के विषय में यह है कि कुछ विद्वान धनु के 15 अंश पर राहु को नीच का मानते हैं और कुछ के मतानुसार वृश्चिक राशि में राहु नीच का होता है।

इसी प्रकार कुछ विद्वानों के मतानुसार मिथुन राशि के 15 अंश पर केतु नीच का होता है और कुछ के मतानुसार वृष राशि में केतु नीच का होता है।

नीचे दिये गए सारिणी में ग्रहों की उच्च तथा नीच स्थिति को प्रदर्शित किया गया है :

ग्रहों का बलाबल

प्रत्येक ग्रह उच्च का होने पर अधिक बलवान् होता है। उसके बाद यदि वह मूल त्रिकोण में हो तो अपनी राशि में रहने की अपेक्षा अधिक बली होता है। तत्पश्चात् स्वक्षेत्री ग्रह बलवान् होता है।

इस प्रकार ग्रहों की शक्ति की मुख्य रूप से चार स्थितियां होती हैं :

(1) सर्वोच्चबली – उच्च का होने पर।

(2) उच्चबली – मूल त्रिकोण में रहने पर।

(3) बली – अपने नक्षत्र (घर) में रहने पर।

(4) निर्बल – नीच का होने पर।

उच्च क्षेत्र, मूल त्रिकोण तथा स्वग्रह के सम्बन्ध में विशेष विचार

नवग्रहों के उच्च क्षेत्रीय, मूल त्रिकोणस्थ तथा स्वग्रही होने के सम्बन्ध में विशेष रूप से नीचे लिखे अनुसार समझना चाहिए :

(1) सूर्य – सूर्य ‘सिंह’ राशि का स्वामी है, अतः यदि वह ‘सिंह’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रही’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाएगा। परन्तु यदि सूर्य ‘सिंह’ राशि में स्थित हो तो सिंह राशि के 1 से 20 अंश तक उसका ‘मूल त्रिकोण’ माना जाता है तथा 21 से 30 अंश तक ‘स्वक्षेत्र’ कहा जाता है। मेष के 10 अंश तक सूर्य ‘उच्च’ का तथा तुला के 10 अंश तक ‘नीच’ का होता है, यह बात पहले बताई जा चुकी है।

(2) चन्द्रमा – चन्द्रमा ‘कर्क’ राशि का स्वामी है, अतः यदि यह ‘कर्क’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रहों’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाएगा। परन्तु यदि चन्द्रमा ‘वृष’ राशि में स्थित हो तो वह वृष राशि के 3 अंश तक उच्च का तथा इसी (वृष) राशि के 4 अंश से 30 अंश तक मूल त्रिकोण स्थित माना जाता है। वृश्चिक राशि के 3 अंश तक चन्द्र नीच का होता है, इसे पहले बताया जा चुका है।

(3) मंगल – मंगल ‘मेष’ तथा ‘वृश्चिक’ राशि का स्वामी है, अत: यदि वह ‘मेष’ अथवा ‘वृश्चिक’ राशि में स्थित हो तो उसे स्वग्रही अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाएगा। परन्तु मेष राशि के 1 से 18 अंश तक मंगल का ‘मूल त्रिकोण’ तथा 11 से 20 अंश तक ‘स्वक्षेत्र’ कहा जाता है। मकर के 28 अंश तक मंगल उच्च का तथा कर्क के 28 अंश तक नीच का होता है।

(4) बुध – बुध ‘कन्या’ एवं ‘मिथुन’ राशि का स्वामी है यदि बुध ‘कन्या’ अथवा ‘मिधुन’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रही’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाएगा। परन्तु कन्या राशि के 1 से 18 अंश तक बुध का ‘मूल त्रिकोण’ तथा उसके आगे 19 से 30 अंश तक ‘स्वक्षेत्र’ माना जाएगा। कन्या राशि के 15 अंश तक बुध उच्च का तथा मीन राशि के 15 अंश तक नीच का होता है।सूचक जाता है।

इस प्रकार यदि बुध कन्या राशि स्थित हो तो वह कन्या राशि के 1 से 15 अंश तक उच्च का और इसके साथ ही 1 से 18 अंश तक मूल त्रिकोण स्थित तथा 19 से 30 अंश तक स्वक्षेत्री होता है।

(5) बृहस्पति (गुरु) – बृहस्पति (गुरु) ‘धनु’ एवं ‘मीन’ राशि का स्वामी है, अतः यदि गुरु ‘धनु’ अथवा ‘मीन’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रही’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाएगा। परन्तु धनु राशि के 1 से 13 अंश तक गुरु का ‘मूल त्रिकोण’ होता है और उसके बाद 14 से 30 अंश तक ‘स्वक्षेत्र’ है। कर्क राशि के 5 अंश तक गुरु उच्च का तथा मकर राशि के 5 अंश तक नीच का होता है।

(6) शुक्र – शुक्र ‘वृष’ तथा ‘तुला’ राशि का स्वामी है, अतः यदि शुक्र ‘वृष’ अथवा ‘तुला’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रही’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाएगा। परन्तु तुला राशि के 1 से 10 अंश तक शुक्र का ‘मूल त्रिकोण’ होता है, तत्पश्चात् 11 से 30 अंश तक उसका ‘स्वक्षेत्र’ है। मीन राशि के 27 अंश तक शुक्र उच्च का तथा कन्या राशि के 20 अंश तक नीच का होता है।

(7) शनिश्चर – शनिश्चर ‘मकर’ तथा ‘कुम्भ’ राशि के स्वामी हैं, अतः यदि शनिश्चर ‘मकर’ अथवा ‘कुंभ’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रही’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाएगा। परन्तु कुंभ राशि के 1 से 20 अंश तक शनिश्चर का ‘मूल त्रिकोण’ होता है और उसके बाद 21 से 30 अंश तक ‘स्वक्षेत्र’ है। तुला राशि के 20 अंश तक शनिश्चर ‘उच्च’ का होता है।

(8) राहु – राहु को ‘कन्या’ राशि का स्वामी माना गया है, अतः यदि राहु ‘कन्या’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रही’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाता है।

कुछ विद्वानों के मतानुसार मिथुन राशि के 0 अंश तक राहु उच्च का तथा धनु राशि के 0 अंश तक नीच का होता है। इसके विपरीत कुछ अन्य विद्वानों के मत से ‘वृष’ राशि में राहु उच्च का तथा ‘वृश्चिक’ राशि में नीच का होता है। कर्क राशि को राहु का ‘मूल त्रिकोण’ माना जाता है।

(9) केतु – केतु को मिथुन राशि का स्वामी माना गया है, अतः यदि केतु ‘मिधुन’ राशि में स्थित हो तो उसे ‘स्वग्रही’ अथवा ‘स्वक्षेत्री’ कहा जाता है। धनु राशि के 15 अंश तक केतु उच्च का तथा मिथुन राशि के 15 अंश तक नीच का होता है।

इसके विपरीत कुछ अन्य विद्वानों के मत से ‘वृश्चिक’ राशि में केतु उच्च का तथा ‘वृष’ राशि में नीच का होता है। सिंह राशि को केतु का ‘मूल त्रिकोण’ माना जाता है।

ग्रहों के पद

नवग्रह मण्डल में सूर्य तथा चन्द्रमा को राजा, बुध को युवराज, मंगल को सेनापति, शुक्र और बृहस्पति (गुरु) को मन्त्री तथा शनिश्चर को सेवक का पद प्राप्त है। जिस व्यक्ति के ऊपर जिस ग्रह का जितना अधिक प्रभाव होता है, उसे वह अपने ही समान बनाने का प्रयत्न करता है।

ग्रहों के बल

ग्रहों के निम्नलिखित 6 प्रकार के बल माने गए हैं :

(1) स्थान-बल।

(2) दिग्बल।

(3) कालबल।

(4) नैसर्गिक-बल।

(5) चेष्टाबल

(6) दृग्बल।

(1) स्थान बल – जो ग्रह उच्च, स्वग्रही, मित्रगृही अथवा मूल त्रिकोण में स्थित होता है, उसे ‘स्थान बली’ कहा जाता है।

चन्द्रमा और शुक्र सम राशि – वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर तथा मीन में, तथा अन्य ग्रह (सूर्य, मंगल, बुध, बृहस्पति, शनिश्चर, राहु एवं केतु) विषम राशि – मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु तथा कुम्भ में स्थित होने पर स्थान बली होते हैं।

(2) दिग्बल – जन्म कुण्डली में प्रथम भाव को पूर्व दिशा, चतुर्थ भाव को उत्तर दिशा, सप्तम भाव को पश्चिम दिशा तथा दशम भाव को दक्षिण दिशा माना जाता है।

बुध और बृहस्पति प्रथम भाव (लग्न) में रहने पर, चन्द्रमा और शुक्र चतुर्थ भाव में रहने पर, शनिश्चर सप्तम भाव में रहने पर तथा सूर्य और मंगल दशम भाव में स्थित रहने पर दिग्बली होते हैं।

(3) कालबल – जातक का जन्म रात्रि में हुआ हो तो चन्द्रमा, शनिश्चर और मंगल ये तीनों ग्रह कालबली होते हैं और यदि दिन में जन्म हुआ हो तो सूर्य, बुध एवं शुक्र कालबली होते हैं बृहस्पति सर्वकाल में बली होता है। मतान्तर से बुध को दिन रात्रि दोनों में ही कालबली माना गया है।

(4) नैसर्गिक बल – शनिश्चर, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, चन्द्रमा तथा सूर्य – ये उत्तरोत्तर एक दूसरे से अधिक बली होते हैं, अर्थात् शनिश्चर से मंगल अधिक बलवान् है, मंगल से बुध अधिक बलवान् है, बुध से बृहस्पति (गुरु) अधिक बलवान् है, बृहस्पति से शुक्र अधिक बलवान् है, शुक्र से चन्द्रमा अधिक बलवान् है तथा चन्द्रमा से सूर्य अधिक बलवान् है। इसी क्रम के अनुसार सूर्य से चन्द्रमा कम बली होता है, चन्द्रमा से शुक्र कम बली होता है, शुक्र से बृहस्पति कम बली होता है, बृहस्पति से बुध कम बली होता है, बुध से मंगल कम बली होता है तथा मंगल से शनिश्चर कम बली होता है।

(5) चेष्टाबल – मकर राशि से मिथुन राशि तक किसी भी राशि में रहने से सूर्य तथा चन्द्रमा चेष्टाबली होते हैं एवं मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र तथा शनिश्चर – ये ग्रह चन्द्रमा के साथ रहने से चेष्टाबली होते हैं।

(6) दृग्बल – जिन दुष्ट ग्रहों के ऊपर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो, वे उनकी शुभ दृष्टि के बल को पाकर दृग्बली हो जाते हैं।

उदाहरण के लिए किसी कुण्डली में शनिश्चर सप्तम भाव में बैठा है और बृहस्पति एकादश भाव में बैठा है, तो बृहस्पति की शनिश्चर के ऊपर पूर्ण दृष्टि पड़ेगी, क्योंकि बृहस्पति जिस भाव में बैठा होता है उस भाव से पांचवें, सातवें तथा नवें भाव को पूर्ण दृष्टि से देखता है (कौन सा ग्रह किस भाव को देखता है इसका वर्णन आगे किया जाएगा)। ऐसी स्थिति में दुष्ट ग्रह शनिश्चर को शुभ ग्रह बृहस्पति का दृष्टिबल प्राप्त होगा।

टिप्पणी – उपर्युक्त छह प्रकारों में से किसी भी प्रकार के बल को प्राप्त बलवान् ग्रह अपने स्वभाव के अनुसार जिस भाव में बैठा होता है, उस भाव का फल जातक को देता है। किसी भी भाव के शुभाशुभ फल की यथार्थ जानकारी प्राप्त करने के लिए उस भाव में स्थित राशि के स्वभाव तथा ग्रह के स्वभाव का समन्वय करके ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिए।

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